क्या है अल-नीनो और क्यों है यह महत्वपूर्ण?
अल-नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, जो प्रशांत महासागर के सतही तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण पैदा होती है। जब समुद्र का यह हिस्सा सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है, तो पूरी दुनिया के मौसम चक्र पर इसका असर पड़ता है। भारत जैसे मानसून-आधारित कृषि देश के लिए यह बदलाव कई बार चुनौती बन जाता है, क्योंकि अल-नीनो के दौरान अक्सर मानसून कमजोर पड़ता है।
2026 में क्यों बढ़ रही है चिंता?
मौसम विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार जुलाई से सितंबर 2026 के बीच अल-नीनो की सक्रियता बढ़ सकती है। यही समय भारत में खरीफ फसलों के लिए सबसे अहम होता है। यदि इस दौरान बारिश सामान्य से कम हुई, तो धान, मक्का, सोयाबीन, कपास जैसी फसलों पर सीधा असर पड़ सकता है। बीते कुछ वर्षों में बढ़ती गर्मी और अस्थिर मौसम ने पहले ही किसानों की मुश्किलें बढ़ाई हैं, और अब अल-नीनो की वापसी इन चुनौतियों को और गहरा सकती है।
जनवरी से मार्च 2026: रबी किसानों के लिए संकेत
अभी के अनुमानों के मुताबिक, साल की शुरुआत यानी जनवरी से मार्च के बीच उत्तर-पश्चिमी भारत में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाकों में गेहूं की फसल इस समय खड़ी रहती है। कम बारिश का मतलब है कि किसानों को सिंचाई पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ेगा। जिन इलाकों में नहर या ट्यूबवेल की सुविधा सीमित है, वहां पानी का प्रबंधन बेहद सोच-समझकर करना होगा।
मध्य और पूर्वी भारत के लिए थोड़ी राहत
जहां उत्तर-पश्चिमी राज्यों में चिंता बढ़ सकती है, वहीं मध्य और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों के लिए मौसम थोड़ी राहत लेकर आ सकता है। इन क्षेत्रों में ठंड का असर गेहूं, सरसों और चने जैसी रबी फसलों के दानों को भरने में मदद कर सकता है। यदि तापमान संतुलित रहा, तो इन इलाकों में पैदावार बेहतर होने की उम्मीद भी की जा सकती है। हालांकि, इसके लिए भी समय पर सिंचाई और पोषण प्रबंधन जरूरी रहेगा।
मानसून पर सबसे बड़ा असर
अल-नीनो का सबसे गहरा प्रभाव मानसून पर पड़ता है। भारत की करीब आधी खेती आज भी बारिश पर निर्भर है। यदि मानसून कमजोर हुआ, तो न केवल फसल उत्पादन घट सकता है, बल्कि जलाशयों और भूजल स्तर पर भी असर पड़ेगा। इसका असर आने वाले रबी सीजन तक महसूस किया जा सकता है। इसलिए 2026 का मानसून किसानों के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकता है।
बदलते मौसम में खेती की रणनीति
मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए अब खेती के तौर-तरीकों में बदलाव करना समय की मांग बन गया है। केवल बारिश के भरोसे खेती करना जोखिम भरा हो सकता है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाकर कम पानी में भी फसलों को बचाया जा सकता है। इसके साथ ही खेत में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग और जैविक पदार्थों का उपयोग भी फायदेमंद हो सकता है।
फसल चयन और समय प्रबंधन
अल-नीनो जैसे वर्षों में फसल चयन का निर्णय बेहद अहम हो जाता है। कम पानी में पनपने वाली किस्मों को प्राथमिकता देना समझदारी हो सकती है। साथ ही बुवाई और कटाई का समय भी मौसम के पूर्वानुमान के अनुसार थोड़ा आगे-पीछे करना लाभकारी साबित हो सकता है। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्रों से सलाह लेकर क्षेत्र के अनुसार सही निर्णय लिया जा सकता है।
मौसम की जानकारी पर रखें नजर
आज के दौर में मौसम की जानकारी पहले से कहीं ज्यादा सुलभ है। मोबाइल ऐप, रेडियो, टीवी और सरकारी अलर्ट के जरिए किसानों तक समय-समय पर अपडेट पहुंच रहे हैं। इन जानकारियों को नजरअंदाज न करें। खासकर मार्च के बाद जैसे-जैसे अल-नीनो को लेकर तस्वीर साफ होगी, वैसे-वैसे अपनी खेती की योजना में जरूरी बदलाव करते रहें।
निष्कर्ष: सतर्कता ही सबसे बड़ा उपाय
अल-नीनो कोई नई घटना नहीं है, लेकिन हर बार इसका असर अलग-अलग रूप में सामने आता है। 2026 को लेकर जो संकेत मिल रहे हैं, वे हमें पहले से सचेत रहने की सीख देते हैं। सही जानकारी, आधुनिक तकनीक और समझदारी से लिए गए फैसले ही कम बारिश और बदलते मौसम में खेती को सुरक्षित रख सकते हैं। उम्मीद है कि आप सभी किसान भाई आने वाले समय के लिए तैयार रहेंगे और अपनी मेहनत को बेकार नहीं जाने देंगे। खेती से जुड़ी ऐसी ही जरूरी और भरोसेमंद जानकारियों के साथ जुड़े रहिए। जय जवान, जय किसान।